Thursday, 4 July 2013

मैंने झील में एक पत्थर फेका


एक झील थी गुमनाम-सी,
शहर के शोर से कुछ दूर।
बड़ा शांत  था सीना उसका,
कभी हलचल दिखी सतह  पे।
धीरे-धीरे कंकड़-पत्थर
अपने पैरों से किनारे  ढकेल देती थी।

मैंने झील में एक पत्थर फेका !
कोई कारण तो था।
दिल में कुछ बातें होंगी ,
दिमाग में कुछ सवाल।
दिल और दिमाग को व्यस्त देख
हाथ स्वतंत्रता दिवस मना रहे थे।

जो मेरा पत्थर चीरता है आज
शांत से झील के तन को,
एक सवाल-सा कूदे है पलट के
छीटों में उसको छाती से।
कि " तुम बेचैन लगते हो,
बड़े  गोले  बरसाते हो।
मुझे बोध दो, क्यों नींद से
मुझको उठाते हो?"

याद आई एक कल की बात।
एक लड़की थी बचकानी-सी,
झील पर पत्थर चुना करती थी वो।
आढ़े-टेढ़े पत्थरों में
कोई रूप देखती थीं उसकी आँखें।
पैरों के दरारों से कभी
दिखता कोई जो गोल-सा पत्थर ,
उठाती थी हथेली पर,
फिर मुझको दिखाती थी।

मुझे ख़ास लगा कभी,
कोई भी झील का पत्थर।
मगर मुस्कान जो देखी
जैसे मोती हो हाथों में।
वो जो नाज़ुक-सा बर्तन था हथेली का,
जो पत्थर संभाल पाता,
मुस्कान देते थे मेरी आँखों को।
मैं हाथों में धर,महसूस कर, उछाल कर
बड़ाई कर देता उसके पत्थर की।
दुपट्टे में बाँध ले जाती वो फिर,
अपने मोती से पत्थर को।

पर अब मैं क्या जवाब दूँ
अपने ही वार से उछले
उन छीटों से प्रशनों को।
क्या मैं बोलूं की तेरे सीने के टुकड़े ,
जो तूने संभाल कर रखे थे
अपने पैरों के किनारों पे।
एक बचकानी-सी लड़की
अपने रेशमी दुपट्टे के कोने में
धर के ले गयी है
तेरे सीने के मोती को।

क्या मैं बोलूं कि
जो लड़की गयी थी ,
वो लौटने वाली नहीं
अब तेरे तट पर।
कि यहाँ मैं भी बैठा हूँ ,
इस बात के डर से।
उसने तेरे किनारे से
जो पत्थर उठाये थे,
वो मुलाकातों के मोती थे।
अब आगे बढ़ चली है वो,
मालाएं मोती की रखती है।
वो डरती है कि
मैं अब मांग बैठूं,
उन मुलाकातों के मोती को।

तो मैं अब मौन बैठा हूँ,
झील के सवालों के आगे।
कैसे समझाउं कि
तू ही अकेला नहीं लुटा है
अपने पत्थर को खोके।
मेरा पत्थर-सा दिल भी
उसके साथ ही गया है,
कभी वापस आने को।

निराशा से देखा जब
उस झील के जल में,
छींटें तो कब की शांत होकर
दब गयीं थीं,शान्ति थी अब।
शायद जानतीं थीं वो,
कि उनके प्रश्नवाचक चिह्नों के
उत्तर नहीं मेरे हवाले में।

जो उत्तर ढूँढतीं हों वो,
तो मेरा अक्स दीखता होगा
उस झील के सीने में।
बहुत पत्थर झेले हैं उसने,
सयानी है, समझती होगी,
मेरी निराशा के उत्तर को।

आँखें भी नम हो गयीं,
इतना कुछ याद आने पे।
एक पत्थर फेक के मैंने
कितने सागर छलका दिए।

मैंने झील में एक पत्थर फेका।।

Thursday, 9 May 2013

आग



सर्द हवा के आगोश में थी वो रात,
हम एक आग जलाकर बैठे रहे।

मैंने अतीत के पेड़ की कुछ टहनियां झोंकिन उसमें,
तुमने भी गुजरे हुए लम्हों के पत्ते तोड़े।
मैंने तुमपे लिखे गीत खाली किये जेबों से,
तुमने भी हाथों से मुरझाये ख़त सौंप डाले आगों की लपेटों को।

आँखों पे मोहब्बत का जो चस्मा था, नोच फेंका
तुमने भी जला डालीं मेरी लकीरें अपने हाथों से।
जो तारें प्यार की जोडती थीं हमको और तुमको
घींच के फेंका उसे भी, आगों के हवालों में।

रात भर बातों की फूंकों ने लौ को जलाए रखा,
रात भर बुझते रिश्ते को तापा हमने।

फ़िज़ायों में जो गंधें थीं, मोहब्बत की
वो भी जल गयीं हैं अब।
अगर आँखों में पानी हो बचा कुछ
तो अब ये शमा बुझा डालो।

कि जितना भी तुम थूकोगे मोहब्बत  के ज़नाजे पे!
ज़हर जो दौड़ता है तुम्हारी बातों में
जलाता जायेगा नफरत की आगों को
जलाता जायेगा जीवन तुम्हारा।
अगर आँखों में पानी हो बचा कुछ,
तो अब ये शमा बुझा डालो।।

Sunday, 27 January 2013

हसरतें

इस दिल के  रेगिस्तान में
अब  हसरतें  हीं पलतीं  हैं।
दिल के सपाट फर्श पर
टीलों सी कुछ उभरतीं हैं।
हवा चलते हीं ये टीले,
यहाँ मिटते, वहां उठते।
ये हसरतें कुछ और
हसरतों में ढल जातीं।

ये चाल में है तेज पर,
उसे रोकने चला हूँ मैं,
उसकी कलाई थामता।
कभी डांट के, कभी टोक के 
उसका मिजाज़ भांपता।
उसके वेग को धीमा पा कभी 
पूछा मैंने उससे बहुत
किसे ढूँढने चली है तू!
कहाँ जाएगी! किस मोड़ तक!

हसरत कहीं मशगूल थी,
सुनती कहाँ मेरा कहा।
चलती रही अपने ही पथ।
हालात को बौना समझ,
उसे लांघने की कशमकश
में जूझती और टूटती।
रोड़े बहुत, कांटे बहुत ,
राहों में सन्नाटे बहुत।
हारी बहुत हालात से,
पर हार से कहाँ हारती 
मंजिल को सबकुछ मानती।
 
फिर भी नहीं समझा कभी 
क्या चाहती हैं हसरतें।
जब तक नहीं मंजिल मिली,
चोटों से, ज़ख्मों से भरी,
ये कर देती है ज़िन्दगी।
जब लक्ष्य उसने पा लिया,
उस क्षण वहीँ हसरत मिटी 
दम तोड़ती ये उस घड़ी।

इस हसरत का 
आगाज़ स्वपन है,
जीवन चुभन है,
अंजाम मरन है।
फिर क्यों  ये सारी जुस्तजू ..

हसरत ने जैसे सुन लिया,
उठके मुझे है ताकती।
मूह खोलके पहली दफा,
अपना बयान बाटती ..
जो मैं हूँ तो हो जिंदा से तुम।
होने से मेरे, स्वपन हैं।
हूँ मैं तो है मंजिल कोई।
न होती मैं तो करता क्या?
क्या बांधता अपनी दिशा!
ये ज़िन्दगी का कारवां,
बुझदिल तेरे ये जिस्म-ओ-जान,
चाहते हैं इक दिशा
जिसके लिए जीती हूँ मैं।
हां ,एक दिन मैं मर जाउंगी।
फिर आयेगी, और हसरत कोई 
तेरी दिशा को बाँधने। "

उस जवाब से लाजवाब हूँ,
सच कह गयी हसरत मेरी।
ये आँख जिनमें ख्वाब हैं,
यह दिल, हैं जिसमे आरज़ू,
ये बाज़ू जिनमे है सख्त ,
रहूँगा उनके दरमियाँ,
जीता रहूँगा ये जहां ..
इन हसरतों के वास्ते ..
इन हसरतों के नाम से ..